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प्रेस समीक्षा  | 14.11.2008

अबकी इंडिया शाइनिंग की चमक नहीं

जर्मन अख़बारों का माननना है कि इस बार भारत में हो रहे चुनावों के दौरान इंडिया शाइनिंग की कोई चमक नहीं दिख रही है. लेकिन आए दिन हो रहे आतंकवादी हमले से जनता डरी हुई है, जबकि आर्थिक मंदी ने उनकी कमर तोड़ दी है.

फ्रैंकफर्ट के दैनिक फ्रांकफुर्टर आलगेमाईने त्साइटुंग का कहना है कि भारत में इंडिया शाइनिंग का उत्साह अब महसूस नहीं किया जा सकता है. दक्षिण में चेन्नई से लेकर उत्तर में दिल्ली तक लोगों को पांच विधानसभा चुनावों और मई तक आम चुनावों के पहले डर है कि और आतंकवादी हमले न हो जाएं. दूसरी ओर उन्हें आर्थिक मंदी का डर है. अखबार का कहना हैः

विकासशील देश चुनाव पर मीडिया की नज़रBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  चुनाव पर मीडिया की नज़रभारत अब एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है. भारत ने अपनी आबादी को सपने दिखाए. ऐसे सपने कि अर्थव्यवस्था में वृद्धि 10 फीसदी से भी ज़्यादा हो सकती है. नई सड़कें बनेंगी, नए घर होंगे. लोगों को काम मिलेगा. बच्चे स्कूल जाएंगे. सब को खाना और साफ पानी मिलेगा. लेकिन हकीकत कुछ और है. आधारभूत ढांचे में सुधार बहुत धीमी गति से हो रही है. और गरीबी अब भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है.

स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख़ से छपने वाले नोये ज़्यूरिख़ त्साइटुंग का पाकिस्तान को लेकर कहना है कि वहां तालिबान का प्रभाव बढ़ रहा है. तालिबान के ख़िलाफ़ सेना के हालिया अभियान ज़्यादा सफल नहीं रहे. इसकी वजह यह है कि सरकार बिल्कुल भी सोच समझकर कदम नहीं उठा रही है. अखबार की टिप्पणी हैः

राष्ट्रपति असिफ अली ज़रदारी की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ युद्ध में काफी लाचार लग रही है. सरकार की कोई स्पष्ट रणनीति भी नहीं दिख रही है. पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशरर्फ की तरह जरदारी भी विरोधाभासी कदम उठा रहे हैं. एक तरफ वे वज़ीरिस्तान में तालिबान को शांति समझौते के साथ शांत कराने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन दूसरे तरफ दो मोर्चों पर, यानी उत्तरी स्वात घाटी में और क़बायली बाजौड़ इलाके में नये सैनिक अभियान चलाए गए.

श्रीलंका की सरकार के अनुसार वह दो महीनों से क्लिनोच्ची से सिर्फ ढाई किलोमीटर दूर है. हालांकि अब तक सरकारी सैनिक लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम यानी लिट्टे की तथाकथित राजधानी पर कब्ज़ा नहीं कर पाए हैं. बर्लिन के टागसत्साईटुंग का कहना हैः

25 साल से चल रहे इस विवाद के लिए जल्द ही एक सैन्य हल निकालना सेना के प्रमुख को भी मुमकिन नहीं लगता. विद्रोहियों ने दक्षिणी और पूर्वी इलाकों में हमले करके यह भी दिखाया कि वह कहीं भी अफरा-तफरी मचा सकते हैं. लेकिन दो लाख नागरिकों के लिए आम ज़िंदगी दिन ब दिन बदतर होती जा रही है. वह अब भी लिट्टे के कब्ज़े वाले इलाके में जी रहे हैं और वे बमबारी की वजह से भागने पर मजबूर हुए हैं. उन्हे खाना पीना उपलब्ध कराना भी मुश्किल हो गया है क्योंकि सेना दवाइयों और खाद्य समाग्री भी वहां पहुंचाने के लिए नहीं तैयार है. और लिट्टे के विद्रोही भी लोगों को भागने की इजाज़त नहीं दे रहे हैं क्योंकि यह नागरिक उन्हें पूरे इलाके की व्यापक बमबारी से बचा रहे हैं.

 
 

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